अक्तूबर 2017

'मितव्ययी कार्यप्रणाली और डिजाइन एक अखिल भारतीय सांस्कृतिक लाभ है'

डॉ. गोपीचंद कटरागड्डा, समूह के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी, टाटा सन्स, तथा नवाचार पर भारत सरकार के कार्यबल के सदस्य, बताते हैं कि किस प्रकार भारत अपने नवाचारी वातावरण को विकसित और मजबूत कर सकता है।

भारत सरकार के नवाचार पर गठित कार्यबल को भारत में नवाचार वातावरण को उन्नत बनाने और वैश्विक नवाचार सूची में भारत की रैंकिंग सुधारने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। लक्ष्यों की प्राप्ति के इसकी क्या योजना है?
वैश्विक नवाचार सूची में इनपुट आंकड़े, जो नवाचार के मुख्य संकेतक होते हैं, तथा आउटपुट मैट्रिक्स सम्मिलित होते हैं, जो नवाचार के मूर्त परिणाम होते हैं। नवाचार कार्यबल के सदस्य भारतीय संदर्भ में इनमें सुधार लाने के लिए विशिष्ट इनपुट तथा आउटपुट मैट्रिक्स पर व्यक्तिगत रूप से काम करते हैं। मेरे इनपुट ज्ञान सृजन, बौद्धिक संपदा, सांस्कृतिक तथा नियामक कार्ययोजना के क्षेत्रों से संबद्ध थे, जिसमें भारतीय बाजार तथा राज्य स्तरीय प्रवर्तन के संकेतकों का इस्तेमाल किया गया था।

वर्तमान में, नीति आयोग ने भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के सहयोग से भारतीय नवाचार सूची तैयार करने का एक कार्य हाथ में लिया है। यह भारतीय नवाचार सूची नवाचार कार्यबल के इनपुट पर आधारित है, और इसका लक्ष्य नवाचार को बढावा देने के लिए राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढावा देना है। मैं भी इसपर गठित परामर्शदाता समिति का एक सदस्य हूं।

भारत ने अपने कई समकक्ष देशों से बेहतर प्रदर्शन किया है और एशिया में नवाचार का एक उभरता हुआ केंद्र बन गया है। यह अपनी प्रगति की प्रक्रिया को किस प्रकार और तीव्र कर सकता है?
भारतीय नवाचार संभावनाओं के लक्ष्य को प्राप्त करने संदर्भ में, ज्ञान तथा तकनीकी उत्पादन से संबद्ध मुख्य चार क्षेत्रों में विशेष कार्रवाई की जरूरत है:

  • अनुभवात्मक शिक्षा को सम्मिलित करने के लिए शिक्षा में सुधार लाना
  • बौद्धिक संपदा प्रक्रिया को तेज करना
  • राष्ट्रीय कार्य-संस्कृति को उन्नत बनाने के लिए एक नियामक कार्ययोजना बनाना तथा व्यावहारिक और क्रियाशील प्रवर्तन के लिए विचारों के परे जाना
  • भारतीय बाजार की शक्ति का इस्तेमाल करना

शिक्षा
नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए, शिक्षा व्यवस्था को निश्चित रूप से समेकित होना चाहिए, हरफनमौला क्षमताओं को प्रोत्साहित करना चाहिए, तथा अगली पीढ़ी के नवाचारी पैदा करने चाहिए जो हाथ-मस्तिष्क-बाजार की बाधा को पार कर सकें। शोध उत्कृष्टता के लिए मौलिक तथा अनुप्रयोगी शोध के मिश्रण के साथ स्नातक कार्यक्रमों का पुनर्गठन करना चाहिए। स्नातक कार्यक्रम में उत्कृष्टता के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग से उद्योग-विश्वविद्यालय सहभागिता में वृद्धि होती है। आज सरकार इन विश्वविद्यालयों में कार्यरत शोधकर्ताओं पर विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तरह खर्च कर रही है। अब समय आ गया है कि सरकार इन वित्तीय सहायताओं में से कुछ को प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालय-उद्योग सहभागिता को एक मानदंड के रूप में मान्यता प्रदान करे और इन परियोजनाओं की सफलता के आंकड़ों के रूप में रणनैतिक बौद्धिक संपदा का उपयोग करे। भारत सरकार के मुख्य कार्यक्रम जो भारत की नवाचार क्षमताओं को समर्थन प्रदान करेंगे, इस प्रकार हैं: उच्चतर आविष्कार योजना तथा इम्पैक्टिंग रीसर्च, इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी। ये कार्यक्रम उद्योग की सहभागिता को अनिवार्यता या प्रोत्साहन प्रदान करते हैं। बौद्धिक संपदा सृजन पर स्पष्ट आंकड़ों के साथ इन कार्यक्रमों के परिणामों का पर्यवेक्षण किया जाना चाहिए। सरकार को इसी अनुरूप राष्ट्रीय महत्व की प्रौद्योगिकी के विकास में उद्योगों के साथ सहभागिता को बढावा देने के लिए DRDO, CPRI, CSIR तथा इस प्रकार की अन्य संस्थाओं को आदेश देना चाहिए।

  • एक कार्यक्रम बनाएं जो यूएस स्माल बिजनेस इनोवेशन रीसर्च (SBIR) प्रोग्राम के समान हो। यह SBIR कार्यक्रम एक उच्चतम प्रतिस्पर्धी कार्यक्रम है जिसके तहत घरेलू लघु व्यवसायों को ऐसे संयुक्त शोध तथा विकास कार्यक्रमों में संलग्न होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है जिसमें व्यवसायीकरण की संभावना मौजूद हो। एक प्रतिस्पर्धी पुरस्कार-आधारित कार्यक्रम के माध्यम से, SBIR छोटे व्यवसायों को यह अवसर प्रदान करता है कि वे अपनी तकनीकी संभावनाओं की तलाश करें तथा इसके व्यवसायीकरण से प्राप्त लाभ में से प्रोत्साहन प्रदान करता है। राष्ट्र के R&D अखाड़े में योग्य लघु व्यवसायों को सम्मिलित करने से, उच्च-प्रौद्योगिकी नवाचारों को प्रोत्साहन मिलता है और राष्ट्र को उद्यमिता की शक्ति प्राप्त होती है क्योंकि इसकी विशिष्ट शोध तथा विकास आवश्यकताएं पूर्ण होती हैं।
  • शोध तथा नवाचार उत्कृष्टता के लिए कुछ (पांच) मुख्य विश्वविद्यालयों की पहचान करें। चयनित विश्वविद्यालयों के वैश्विक श्रेष्ठतम 100 विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल करने के लिए 25 वर्षों की एक कार्ययोजना बनाएं। वैश्विक मानकों को पूर्ण करने के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता सुनिश्चित करें। विदेशी छात्रों तथा महिलाओं को आकृष्ट करने और एक विविधतापूर्ण तथा विचार-समृद्ध वातावरण का निर्माण करने के लिए परिसर बनाएं। स्पष्ट आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराए जाने चाहिए जिनके साथ संबद्ध प्रकाशन, एच-सारणी, विभेद तथा पेटेंट भी सम्मिलित हो।
  • IIT संस्थानों में सुधार लाने की जरूरत है ताकि वे अंतर्स्नातक स्तर पर प्रवेश परीक्षाओं में और अधिक समावेशी हों जिनके तहत विषय के साथ रुझान और प्रायोगिक जांच भी सम्मिलित होनी चाहिए।
  • विश्वविद्यालयों तथा सरकारी प्रयोगशालाओं को दिए जानेवाले सरकारी शोध वित्तीय सहायता का 20% हिस्सा लक्षित उद्देश्य के समरूपी क्षेत्रों में औद्योगिक सहभागिता तथा अनुप्रयोगी शोध के लिए सुरक्षित किया जाना चाहिए। वित्तीय सहायता का 80% भाग राष्ट्रीय महत्व के शुद्ध विज्ञान आधारित शोध में लगाया जा सकता है।
  • प्रायोगिक शिक्षण के आधार पर पाठ्यक्रम तथा शिक्षण सामग्री के उन्नयन द्वारा देशभर के सरकारी स्कूलों का सशक्तिकरण। अगस्त्य फाउंडेशन तथा प्रथम फाउंडेशन जैसे संगठनों का उपयोग करना।
  • राष्ट्र के लिए दीर्धावधि लाभकारी बड़े परिणाम प्राप्त करने के लिए नवाचार को बढावा देने में उद्योगों को डॉक्टरेट अनुसंधान के लिए प्रधानमंत्री की सदस्यता योजना का लाभ उठाना चाहिए। उद्योग (CII के माध्यम से) कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार एवं स्थायी गुणवत्ता सुनिश्चित करने में आगे बढ़कर काम करें।

उद्योगों को भारत सरकार की कौशल विकास के लिए राष्ट्रीय योजना एवं राष्ट्रीय व्यावसायिक शिक्षा योग्यता कार्ययोजना में सहभागी बनना चाहिए। औद्योगिक निकाय (CII के माध्यम से) कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार तथा इसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने में आगे बढ़कर काम कर सकते हैं।

बौद्धिक संपदा
भारत में एक पेटेंट प्रदान करने के लिए दिए गए आवेदन को लंबित रखने की औसत अवधि 5 साल से ज्यादा है। यह त्वरित नवाचार के युग में स्वीकारणीय नहीं है। बौद्धिक संपदा अधिकार प्रदान करने के लिए अतिरिक्त संसाधन का समयबद्ध आवंटन तथा नियम का सही अनुपालन इस समय की मांग है। बौद्धिक संपदा को प्रोत्साहित करने के लिए, पेटेंट (संशोधन) नियम, 2016 के तहत अनुरोध पर शीघ्र पेटेंट परीक्षण का प्रावधान किया गया है। नए शामिल किए गए नियम का उद्देश्य पेटेंट के लिए तत्काल आवेदन की स्वीकृति अवधि को प्रचलित 5-7 वर्षों से घटाकर मार्च 2018 तक 18 माह तक ले आना है। यह एक बेहतरीन प्रयास है।

  • पेटेंट आवेदनों के त्वरित निपटान के लिए ‘पासपोर्ट सेवा तृतीय पक्ष’ की भांति एक मॉडल का उपयोग करें। नवाचार परीक्षण सहित सभी आधारभूत कार्यों को आउटसोर्स किया जा सकता है। सभी बोर्डों में पेटेंट लंबित रखने की अवधि को घटाकर 3 वर्ष तक लाया जाना चाहिए।
  • अंशकालिक कानूनी शिक्षा पर नीतियों को शिथिल किया जाना चाहिए। इससे IP पेशेवरों की एक सशक्त आबादी बनाने में सहायता मिलेगी।
  • भारतीय पेटेंट कार्यालय डेटाबेस को और अधिक समग्र तथा पहुंचयोग्य बनाया जाना चाहिए। पेटेंट पर काम करनेवाले लोगों के लिए उपलब्ध कराया गया डेटा भारतीय पेटेंट कार्यालय के डिजिटलीकरण का एक बढ़िया उदाहरण है।

सांस्कृतिक तथा विनियामक कार्ययोजना

  • कार्य नैतिकता, कारीगरों तथा प्रायोगिक कार्यों को सम्मान, लैंगिक विविधता तथा अभियंत्रण में महिलाओं पर एक राष्ट्रीय गौरव विज्ञापन अभियान का आयोजन करें।
  • राज्य के साथ औद्योगिक तथा राष्ट्रीय निकायों जैसे केंद्रीय विनिर्माण प्रौद्योगिकी संस्थान तथा अन्य समकक्ष भारत सरकार के संगठनों की सहभागिता को प्रोत्साहित किया जाए। स्पष्ट सफलता उपायों का निर्माण करें तथा उसकी प्रभावी निगरानी करें।
  • देश के विभिन्न भागों में स्थित राज्य या केंद्र द्वारा वित्तपोषित संस्थानों की सूची बनाएं, जिन्हें R&D तथा अन्य ज्ञान सेवाओं के माध्यम से किसी खास क्षेत्र में औद्योगिक तथा उद्यमिता उन्नयन की जिम्मेदारी दी गई है (ये संस्थान विश्वविद्यालय या CSIR की कोई प्रयोगशाला या राज्य संपोषित कोई संस्था जैसे उद्यमिता विकास संस्थान हो सकती है)। इन निकायों को अतिरिक्त रूप से नवाचार केंद्र के रूप में अभिहित किया जाए और औद्योगिक परियोजनाओं को गति प्रदान करने के लिए उद्योगों के साथ इनके संपर्क के आधार पर इनके वित्तपोषण को पुनर्गठित किया जाना चाहिए।
  • इन नवाचार केंद्रों को सरकारी R&D निधियों के प्रभावी उपयोग को आसान बनाने में सहायता प्रदान करनी चाहिए। इस समय इन निधियों के लिए पात्र उद्यमियों को या तो इस प्रकार की किसी निधि के बारे में जानकारी नहीं है या या वे नहीं जानते कि उन्हें किस प्रकार इसका लाभ मिलेगा। नवाचारकर्मियों तथा उद्यमियों के बीच इन सरकारी R&D निधियों का वितरण बेहद पारदर्शी होना चाहिए और नवाचार केंद्र यह पारदर्शिता सुनिश्चित करें।
  • राष्ट्रीय नवाचार निधि और इसके उपयोग के लिए एक उचित तंत्र का सृजन किया जाए ताकि और अधिक नौकरियां तथा धन का सृजन किया जा सके।

बाजार का लाभ उठाना

  • बिजली के उत्पादन, पारेषण तथा वितरण की लक्षित क्षमता प्राप्त करने के लिए एक वित्तपोषित कार्ययोजना का निर्धारण किया जाए।
  • भारत की जल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक वित्तपोषित कार्ययोजना का निर्धारण किया जाए।
  • समाज के सभी वर्गों को सस्ती स्वास्थ्यसेवा उपलब्ध कराने के लिए एक वित्तपोषित कार्ययोजना का निर्धारण किया जाए।
  • ग्रामीण आबादी को खाद्य के सस्ते पूरक तत्व उपलब्ध कराने के लिए प्रौद्योगिकी (जैसे सस्ते, स्थानीय अत्था पोषक खाद्य पदार्थ) का निर्धारण किया जाए, ताकि उन्हें अपेक्षित कैलोरी तथा संतुलित भोजन मुहैया कराया जा सके। (इस प्रकार की प्रौद्योगिकी का विकास करने के लिए केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी शोध संस्थान तथा अन्य प्रमुख संस्थानों के साथ PPP मॉडल पर सहयोग प्राप्त करना चाहिए) भारत में खाद्यान्न भंडारण की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए एक योजना बनाई जाए।
  • ऊर्जा, जल, परिवहन, स्वास्थ्यसेवा तथा खाद्य सुरक्षा जैसी समस्याओं की गंभीरता के अनुसार जैसा उचित हो, इनका विनियमन किया जाना चाहिए।

क्या आप राष्ट्र के नवाचार पर्यावरण को विकसित करने में राज्य-स्तरीय योगदान की भी कोई भूमिका देखते हैं?
हाँ। राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ उनके मुख्य सचिवों को राज्य नवाचार एजेंडे पर एक स्पष्ट नेतृत्व प्रदान करना होगा। इस नेतृत्वकारी भूमिका के तहत अवसंरचना तथा कौशल विकास के लिए वित्तपोषण के निर्णय करना, उन एजेंसियों तथा कंपनियों को उत्तरदायी बनाना जो अभियंत्रण तथा नवाचार के लिए सरकारी सहायता प्राप्त कर रहे हैं, तथा राज्य के भीतर तथा बाहर नवाचार के ब्रांड दूत की भूमिका अदा करने के कार्य सम्मिलित होंगे। मुख्यमंत्रियों तथा मुख्य सचिवों को (राज्य नवाचार परिषद के तत्वावधान में) औद्योगिक सहभागिता के साथ एक मुख्यमंत्री नवाचार कार्यबल का गठन करना होगा ताकि राज्य स्तर पर नवाचार को बढ़ावा मिल सके। इस कार्यबल के उत्तरदायित्वों में निम्नलिखित सुझावों को स्थान देना चाहिए:

  1. हर राज्य अपनी नवाचार संभावनाओं का निर्धारण करे। यह नवाचार संभावना उसकी विशिष्ट भिन्नता पर आधारित होगी जैसे सांस्कृतिक विशेषता, प्रतिभा उपलब्धता, विशिष्ट क्षमताओं के साथ विश्वविद्यालयों की उपस्थिति, प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता तथा एक नवाचार पर्यावरण के अन्य आयाम। (उदाहरण के लिए, अखिल भारतीय सांस्कृतिक संभावनाओं के लिए मितव्यययी कार्यशैली तथा डिजाइनें एक उदाहरण हैं। आंध्र प्रदेश तथा कर्णाटक के लिए आईटी तथा अभियंत्रण एक संभावना है, पश्चिम बंगाल के लिए सांख्यिकी, तथा बिहार और झारखंड के लिए प्राकृतिक संसाधन (कोयला आदि) एक संभावना है।)
  2. हर राज्य को नवाचार केंद्रित लक्ष्य के लिए एक खास क्षेत्र का चुनाव करना चाहिए और उसके लिए कौशल तथा अवसंरचना विकास मुहैया कराना चाहिए। नवाचार केंद्रित क्षेत्र का चयन राज्य के नवाचार संभावना क्षेत्र पर निर्भर होना चाहिए जैसा कि पूर्व के अनुच्छेद में बताया गया है। (उदाहरण के तौर पर, दिल्ली राज्य के लिए CII की अनुशंसा थी कि वह रचनात्मक, जीवन विज्ञान तथा स्वास्थ्यसेवा पर केंद्रित हो और सेवा क्षेत्रों का चयन करे।)
  3. भारत सरकार ने एक राष्ट्रीय विनिर्माण नीति की घोषणा की है जिसका उद्देश्य एक दशक के भीतर GDP में विनिर्माण का हिस्सा बढ़ाकर 25% तक ले जाना और 100 मिलियन नौकरियों का सृजन करना है। राष्ट्रीय निवेश तथा विनिर्माण जोन (NIMZ) इस विनिर्माण नीति के महत्वपूर्ण कार्यकारी अंग हैं। हर राज्य अपने निर्धारित नवाचार केंद्रित क्षेत्र के आधार पर NIMZ की स्थापना तथा विकास कर सकता है।
  4. हर राज्य को इसकी योजना बनानी चाहिए और उसे अपने मौजूदा नवाचार प्रमुख क्षेत्र को और अधिक सक्रिय करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर कर्णाटक राज्य में केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, भारतीय विज्ञान संस्थान आदि; महाराष्ट्र में राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला, IIT-B, आदि का उल्लेख किया जा सकता है) यह विचार उन दृष्टिकोणों, जिनके तहत इन संस्थानों की स्थापना की गई थी, और नवाचार एजेंडा को बल देने के लिए इन संस्थानों का उपयोग करने के विचारों पर केंद्रित है।
  5. कमजोर औद्योगिक-विश्वविद्यालय सहभागिता के मसले का एक पक्ष IP और रॉयल्टी के मुद्दे पर मौजूदा अविश्वास भी है। अपने प्रधानमंत्री फेलोशिप स्कीम तथा ग्लोबल इनोवेशन &टेक्नोलॉजी एलाइंस तथा अपने द्विपक्षीय R&D कार्यक्रमों के माध्यम से CII को IPR स्वामित्व तथा लाइसेंस के करार नियम और शर्तों के मानकीकरण के मसले पर सहायता प्रदान करनी चाहिए, ताकि उद्योग तथा अकादमिक जगत के बीच कठिन करार समझौतों को मूर्त रूप दिया जा सके। यह सेवा स्थानीय CII अधिकारियों के जरिए राज्य स्तर पर मुहैया करायी जानी चाहिए।
  6. हर राज्य को अपने भौगोलिक संकेतकों (GI) को अपनी बौद्धिक संपदा के रूप में निर्धारित, संरक्षित, ब्रांड पहचान तथा बाजार में प्रस्तुत करना चाहिए (उदाहरणस्वरूप, पश्चिम बंगाल से दार्जलिंग चाय, आंध्रप्रदेश से पोचमपल्ली इकात, तथा राजस्थान से कोटा डोरिया आदि को लिया जा सकता है।) इसके अलावा, आयुर्वेद/ सिद्ध औषधि, भारतीय पोशाक तथा अन्य संभावना क्षेत्रों की भी खोज की जानी चाहिए। इसका लाभ वैश्विक विक्रय तथा नौकरी सृजन में बढोत्तरी पर लक्षित होना चाहिए। एक GI के पंजीकरण तथा अनुरक्षण का खर्च काफी ज्यादा है, और इसे राज्य सरकार द्वारा उपयुक्त निकायों के सहयोग से वहन किया जाना चाहिए (जैसे चाय के मामले में भारतीय चाय बोर्ड)। विशिष्ट नीतिगत लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अधिकतम संभावनायुक्त GI के चयन में सतर्कता से सार्वजनिक लाभ में वृद्धि होगी।
  7. उद्यमिता को राज्य सरकारों द्वारा प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और इसके लिए उन्हें स्कूल स्तर से ही उद्यमिता के शिक्षण का प्रावधान करना चाहिए तथा नए उपक्रमों को स्थापित करने और चलाने के लिए पारदर्शी प्रक्रियाएं स्थापित करनी चाहिए। वर्तमान में, विनियामक अभिकरणों द्वारा अपनाई जानेवाली स्वीकृति प्रक्रियाएं पारदर्शी तथा समयबद्ध नहीं हैं। CII जैसे औद्योगिक निकाय तथा राज्य सरकारें उद्यमिता को सहायता प्रदान करने के लिए राज्य-स्तरीय कार्ययोजनाओं के सृजन और अनुपालन में सहभागिता कर सकती हैं, जिससे और अधिक समृद्धि तथा रोजगार पैदा होंगे।