फरवरी 2017 | सिंथिया रोड्रिग्स

कॉफी व्हिस्परर

कॉफी पारखी और टाटा कॉफी की डायरेक्टर सुनालिनी मेनन विशिष्ट स्टारबक्स रिजर्व टाटा नेल्लोर एस्टेट की खेत के लेकर ख्याति तक की यात्रा के बारे में बताती हैं

बेंगलुरू के अपने कॉफी टेस्टिंग लैब में सुनालिनी मेनन

उनके उत्साह और जोश से प्रभावित रह जाना संभव नहीं। कॉफी परंपरा में 39 साल खपाने के बाद (उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया से की थी), सुनालिनी आज बेंगलुरू की एक आकर्षक जगह पर कॉफी टेस्टिंग लैब चलाती हैं। उनके अनुभव भरे सालों ने उन्हें कॉफी, उसके मूल, उसके किस्मों, बाजारों और हां,पीने के लिए कॉफी तैयार करने की विधि का एक चलता फिरता एनसाइक्लोपीडिया बना दिया है।

वर्षों से, उन्होंने क्षेत्र में समय गुजार कर सुश्री मेनन ने ज्ञान का ऐसा भंडार विकसित किया है जो कॉफी के बीज के वर्गीकरण के लिए उनके अंदर एक अंतर्जात क्षमता निहित करता है। वे कहती हैं, ‘मेरे लिए मस्तिष्क की शक्ति और मन का उत्साह दो ऐसे तत्व हैं कॉफी के बीज के साथ संयोजित हैं। मेरे हाथ मजबूत होने चाहिए और मेरे दिल में जुनून होना चाहिए। कॉफी जीवंत बीज है, कोई निर्जीव उत्पाद नहीं। वह बताती हैं कि कॉफी के बीजों को सुनना उन्हें व्यक्तित्व तथा बीज की यात्रा को समझने में मदद करता है और यह भी समझने में मदद करता है कि क्या किसान ने बीजों के संचालन में असावधानी बरती है या उसने इसके गुणों के उन्नयन के लिए इसका संवर्धन किया है।

कॉफी के बारे में यह सुश्री मेनन की आंतरिक समझ है जिसने उन्हें उस प्रयास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में मदद की जो स्टारबक्स के सिएटल रोस्टरी में भारतीय कॉफी का परचम फहराता है। टाटा कॉफी के नल्लोर (कर्नाटक के कोडगू में) एस्टेट में उगाई गई कॉफी स्टारबक्स द्वारा विरल और विशिष्ट कॉफी के रिजर्व सेलेक्शन में चुनी गई। नल्लोर कॉफी एक माइक्रोलॉट है, एक सीमित एडिशन वाली कॉफी है जो एक खास ईकोसिस्टम के लिए विशिष्ट है।

चर्चा किस बात की है?
सुश्री मेनन को नल्लोर माइक्रोलॉट के अनुभव का हिस्सा बनने पर गर्व है। कंपनी के 2015 की सालाना जेनरल मीटिंग (एजीएम) में काम की शुरुआत हुई जब सुश्री मेनन ने एस्टेट के मैनेजरों को संबोधित किया और माइक्रोलॉट की संकल्पना से उन्हें परिचित कराया। यह उनके लिए नया था और अधिकतर लोगों को यह नहीं समझ में आया कि चर्चा हो किस बारे में रही है। उनके मार्गदर्शन में काम शुरू हुआ।

नल्लोर एस्टेट माइक्रोलॉट की रचना के लिए किए गए प्रयासों को याद करते हुए वह कहती हैं, ‘हमने बहुत से बदलाव किए और उन सबसे फर्क पड़ा। हमने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि हर फल का एक निश्चित रंग हो और उनका एक निश्चित स्वाद हो। हमने प्रॉसेसिंग की प्रक्रिया में सुधार किया।’

ये प्रयास कारगर रहे और टाटा नल्लोर एस्टेट कॉफी का अवतरण हुआ। वह कहती हैं, यदि आप मुझे पूछें कि नल्लोर क्या है तो मेरा जवाब होगा यह बहुत ही रसीली कॉफी है, जिसमें नारंगी और नींबू के फ्लेवर हैं और साथ में कुछ हरे सेब और लाल सेब तथा थोड़ा चॉकलेट का स्वाद। और जहां-तहां, टोस्टेड नट तथा हर्बल की छ्टा’

इस तरह के वर्णन के साथ इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि टाटा नल्लोर एस्टेट कॉफी भारत का पहल माइक्रोलॉट है जिसे स्टारबक्स रिजर्व कॉफी की श्रेणी में चुना गया। सुश्री मेनन कहती हैं, ‘नल्लोर की खूबसूरती इसकी ट्रेसैबिलिटी को लेकर है। यह पता रहता है कि किन लोगों ने इसे उगाया है, कैसे उन्होंने इसका परिचालन किया, इसे सुखाया; हमारे पास एस्टेट के शेड पैटर्न, प्रॉसेसिंग में प्रयुक्त मशीनरी यहां तक कि स्थानीय फल चमगादड़ तक की जानकारी रहती है जिसके आधार पर हम बीज के फ्लेवर की व्याख्या करते हैं।’

यह विवरण वास्तव में बारीक और जटिल होता है। सुश्री मेनन बताती हैं की एक अच्छी कॉफी की कई बारीकियां होती हैं, जैसे कि- जब धूप कम और छांह अधिक होती है तो चेरी को परिपपक्व होने के लिए अधिक समय की जरूरत होती है; ऊंची जगहों पर उगने वाली कॉफी हमेशा अधिक जायकेदार होती है, आदि-आदि। उनकी बातें ध्यान से सुनें तो कॉफी के प्रति हमारी सराहना बढ़ जाती है। आप कॉफी के बीजों को एक समग्र व्यक्तित्व के रूप में देखने लगते हैं, जहां इसकी पृष्ठभूमि और इसके संवर्धन के प्रत्येक तत्व अंतिम रूप से उत्पाद के रूप में तैयार होने वाली कॉफी के निर्धारक तत्व होते हैं।

इस विवरण विशेष, नल्लोर एस्टेट में स्टारबक्स द्वारा चयन ने एक नए जीवन का संचार किया है। सुश्री मेनन कहती हैं, ‘पहले, उत्पादन और उपज का ख्याल एस्टेट मैनेजर किया करते थे। वे कंपनी के गौरवान्वित होने वाली अवधारणा, अपनी ख्याति और अपनी कॉफी के लिए क्वालिटी वाले तत्व पर अधिक ध्यान नहीं देते थे। नल्लोर ने यही बदलाव किए हैं।’

समवेत भाव
इस साल के एजीएम में, सुश्री मेनन को अधिक उत्साह और प्रयास की महती भागीदारी देखकर संतोष हुआ। सारा माहौल ही अब सही दिशा में मोड़ा जा चुका है। लोग अब उत्साही हैं, और अब उन्हें अपने काम में जुनून का अहसास होता है।’ एक एस्टेट मैनेजर ने तो यहां तक कहा कि उनके दिमाग में 10 प्रॉसेस हैं जिन्हें वह आजमाना चाहते हैं। ‘मैंने उन्हें जोखिम लेने के विरुद्ध चेताया,’ सुश्री मेनन कहती हैं, उन्हें इस बात का संतोष है कि उनके छात्र अब एस्टेट की वनस्पतिओं, जीव-जंतुओं और माइक्रो-क्लाइमेट की हर पहलू का अध्ययन कर यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि वे किस प्रकार कॉफी के स्वाद और सुगंध को प्रभावित करते हैं।

‘इसमें विज्ञान है’, वह बताती हैं। ‘इसीलिए अब मैनेजर को दक्ष और जानकार होना पड़ता है, तथा चीजों को वैज्ञानिक नजरिए से समझना पड़ता है। मुझे भरोसा है कि इस साल हमें और भी अच्छी कॉफी मिलेगी। अंतर्निहित क्वालिटी का स्तर बेहद ऊंचा है।’

अन्य बहुत सी अच्छी चीजें हैं जो टाटा कॉफी के निर्माण में योगदान देती हैं। सुश्री मेनन कहती हैं, ‘उनके लिए बहुत सी बातें मायने रखती हैं, स्थान की टपॉग्रफी, ऊंचाई, अद्यतन प्रॉसेसिंग मशीनरी, उनके सांस्कृतिक रिवाज और व्यवसाय की प्रक्रिया तथा उनके वे समर्पित लोग जो पीढ़ियों से इसमें काम कर रहे हैं। यह वैसा ही है जैसा सोने की खदान पर बैठना।’

टाटा कॉफी से मिलने वाली सबसे बड़ी सहायता थी प्रबंधन का प्रेरण और बदलाव की सहमति, फिर चाहे यह हमें उनके रवैये से या मुहैया की गई अवसंरचना से मिली।

सुश्री मेनन के लिए कॉफी के बीच एक जीवंत वस्तु, जिसमें सांसें हैं; जो किसानों और संग्राहकों के परिश्रम की याद दिलाती हैं; वार्ता, हास्य और स्मृतियों का दूत; एक गरी जो अपने अंदर रचनात्मकता के दानों को छुपाए रखती है।

इस आलेख का प्रथम प्रकाशन टाटा रिव्यू के अक्टूबर-दिसंबर 2016 अंक में हुआ था। ईबुक यहां पर पढ़ें